एनसीईआरटी द्वारा इतिहास के` कुछ अध्यायों को हटाने पर विवाद शैक्षणिक नहीं बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैंडॉ रविन्द्र प्रताप सिंह

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एनसीईआरटी द्वारा इतिहास के` कुछ अध्यायों को हटाने पर विवाद शैक्षणिक नहीं बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैंडॉ रविन्द्र प्रताप सिंह

Sunday, April 9, 2023 | April 09, 2023 Last Updated 2023-04-09T15:37:51Z
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एनसीईआरटी द्वारा इतिहास के` कुछ अध्यायों को हटाने पर विवाद शैक्षणिक नहीं बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैं
डॉ रविन्द्र प्रताप सिंह
शोध सहायक, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् नई दिल्ली 

जब से एनसीईआरटी ने इतिहास विषय में एक्सपर्ट कमेटी के अनुसंशा पर बदलाव करने का फैसला किया है तब से एकबार फिर वामपंथी और कांग्रेसी विचारधारा से सम्बंधित अकादमिक गुट सक्रिय हो गया है और ऐसा पहली बार नही हो रहा है | ऐसा ही माहौल तब भी तैयार किया गया था जब एनडीए प्रथम की सरकार में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी के समय इतिहास विषय में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को आतंकवादी आंदोलन के नाम से पढ़ाया जा रहा था

और एनसीईआरटी ने इतिहास से आतंकवादी शब्द को हटाने का निर्णय लिया था। इसके साथ ही बहुत से ऐसे तथ्य जो भ्रामक थे और जानबूझकर गलत तरीके से तथ्यहीन होने के बाद भी से इतिहास विषय के रूप में बच्चों को पढ़ाया जा रहा था जिसका एकमात्र उद्देश्य यह था कि देश के आने वाली हमेशा कांग्रेस और गांधी को देश की आजादी के आंदोलन का एकमेव स्रोत समझें और मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक साम्प्रदायिक शक्तियों के रूप में चिह्नित करें।

एनडीए प्रथम में एनसीईआरटी के इतिहास में बदलाव भी किया गया लेकिन दुर्भाग्यवश एनडीए सरकार सत्ता वापसी नहीं कर पाई और कांग्रेस समर्थित सरकार ने सत्ता में आते ही उसी पूराने इतिहास के सिलेबस को फिर से लागू कर दिया। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि देश में एक खिचड़ी के गठबंधन सरकार ने उस वक्त सिलेबस को बदलने में अपने अधिकारों के प्रयोग किया और अपने पूर्ववर्ती सरकार के फैसले को बदला तो एक पूर्ण बहुमत की सरकार जिसको देश ने दोबारा प्रचंड बहुमत दिया है उसने एक्सपर्ट कमेटी की सलाह पर अगर कुछ बदलाव किए भी है तो इसपर इतना हंगामा खड़ा क्यों किया जा रहा है।

वास्तव में जैसे जैसे देश के अंदर इतिहास विषय में नये नये शोध के माध्यम से नई जानकारियां निकल कर आ रही है और उन नये तथ्यों से भारतीय इतिहास के साथ वामपंथी इतिहासकारों और कांग्रेसी शासन के गठजोड़ की कूट रचित इतिहास की परतें खुलती जा रही है उससे इनके बीच भारत विभाजन में कांग्रेस की साम्प्रदायिक राजनीति का काला अध्याय और वामपंथियों के सोवियत संघ समर्थित राजनीति की असलियत सामने आने का डर घर कर गया है।

 वास्तव में यह विरोध इतिहास विषय से कुछ चैप्टर को हटाने से कहीं ज्यादा अपने द्वारा देश के ऊपर थोपें गए तथ्यहीन इतिहास पर कटघरे में खड़ा होने से बचने का है। प्रोफेसर ई. एच कार ने अपनी पुस्तक इतिहास क्या है मे लिखा है कि इतिहास की व्याख्या समय के साथ उद्घाटित होने वाले तथ्यों और सूचनाओं के आलोक में परिवर्तनशील है।

जैसे जैसे नये तथ्य एवं जानकारियां जुड़ते जाएंगे वैसे वैसे ही इतिहास की व्याख्या और विषयवस्तु में परिवर्तन होता रहेगा। प्रोफेसर बिपन चन्द्रा ने भी स्वीकार किया है कि कोई भी इतिहासकार अपने इतिहास लेखन को सार्वभौम होने का दावा नहीं कर सकता। प्रोफेसर कालिंगवुड ने अपनी पुस्तक आइडिया आफ हिस्ट्री में लिखा है कि सम्पूर्ण इतिहास किसी भी इतिहासकार के वैचारिक अभिव्यक्ति का इतिहास है जो यह दर्शाता है

 कि वह इतिहास को और उसके तथ्यों को किस रूप में देखता है। ऐसा नहीं है यह इतिहासकार इन इतिहासकारों को और उनके किताबों को पढ़ा नहीं है लेकिन जब कोई विद्वान किसी राजनीतिक दल और विचारधारा के समर्थक के रूप में कार्य करने लगता है तो फिर वह जानबूझकर लोगों को अपने अकादमिक आभामंडल के प्रभाव से विचलित करने का प्रयास करना आरंभ करने लगता है

जैसे कि अभी हो रहा है। 
दुनिया भर का नैसर्गिक प्राचीन इतिहास कबीलों से शुरू होता है | यूरोपीय देश खासकर यूनानी आज भी मैग्नास्पार्टा को अपने इतिहास का राष्ट्रीय धरोहर मानते हैं, लेकिन भारत का प्राचीन इतिहास सिन्धु नदी घाटी की विश्वप्रसिद्ध नगरीय सभ्यता से आरंभ होकर आर्यों के क़बीलाई इतिहास की ओर बढ़ता है।

 क्या यह किसी भी मानव सभ्यता के इतिहास का शुरुआती चरण हो सकता है जो गाँव और कबीलों के बसने से पहले नगरीय सभ्यता बन गई हो ? बिलकुल भी नहीं और न ही दुनियां के किसी भी इतिहास में कोई एक भी उदाहरण उपलब्ध है | लेकिन सिलेबस के बदलने का विरोध कर रहे लोगों के पास इस तथ्य का कोई जवाब नही है कि जब कोई सभ्यता बिना ग्रामीण सभ्यता से गुजरे सीधे नगरीय सभ्यता नही बन सकती तो अंग्रेजों द्वारा थोपा गया झूठा इतिहास क्यों नही बदला गया

 इसके दो ही कारण हो सकते है पहला यह कि आज भी ये अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम है और दूसरा यह कि ये लोग भारत में रहते हुए अंग्रेजो द्वारा निर्मित इतिहास की वैधता को संरक्षित रखना चाहते है ताकि भारत में यह इतिहास जातिवाद और साम्प्रदायिकता का पोषण करता रहे |

मैं मध्यकालीन भारतीय इतिहास का उदाहरण हूं। इतिहास के इस भाग में पढ़ाया जाता है कि बरनी, अफीफ, सिराज, बदायुनी, अबुल फजल जैसे राजाश्रय प्राप्त लेखकों की कृतियां मध्यकालीन भारत के इतिहास को लिखने के प्रमुख स्रोत है। कमोबेश भारत का मध्यकालीन इतिहास इनकी लिखीं किताबों का ट्रांसलेशन मात्र है।

लेकिन उसी दौर में लिखा गया चंद्रबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो, हम्मीरमद मर्दन, पृथ्वीराज विजय जैसे अनेक ग्रंथों को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया है कि यह दरबारी इतिहासकारों ने राजा की चाटुकारिता में लिखें है जिनके तथ्यों पर विश्वास करना कठिन है। लेकिन यही तर्क़ वह इन मुस्लिम दरबारी इतिहासकारों पर लगाने से मुकर जाते हैं।

 इन्हें बरनी की यह लाइन लिखने में ऐतिहासिक तथ्य दिखाई पड़ता है कि मुहम्मद तुगलक राजधानी परिवर्तन के समय दिल्ली में छिपे एक अंधे और एक विकलांग को घोड़ों से बांधकर दौलताबाद ले गया लेकिन चंद्रबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो में उल्लिखित "चार अंश चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण, ता बैठा सुल्तान है अब न चुक चौहान" अतिशयोक्ति और तथ्यहीन लगता है।

इनके अनुसार बरनी का यह कथन तर्कपूर्ण लगता है की मुहम्मद तुगलक द्वारा सांकेतिक मुद्रा के रूप तांबे के सिक्के का प्रचलन होने पर हर हिन्दू का घर टकसाल बन गया और मुस्लिम बिलकुल साफ पाक थे| तथ्य यह है की हल्दीघाटी का युद्ध दो राजपूत सेनाओं क्रमशः महाराणा प्रताप और मानसिंह के बीच लड़ा गया जिसमे मानसिंह की मदद मुग़ल सेना ने किया लेकिन महाराणा प्रताप को अकबर से पराजित दिखाया गया I तथ्य यह भी है

 कि हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप ने कई युद्धों में मुग़ल सेना को न केवल पराजित किया बल्कि अपने अपने हारे हुए समस्त भूभाग का अधिकांश हिस्सा पुनः वापस जीत लिया | क्या एनसीईआरटी के इतिहास में उन युद्धों का जिक्र है ? अगर नही है तो क्यों नहीं है इसका जवाब क्या यह विरोध करने वाले देंगे

आधुनिक भारत का इतिहास भारत का इतिहास होने के बजाय कांगेस की स्थापना और उसके द्वारा असफल आंदोलनों का इतिहास भर क्यों है ? कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ पैक्ट के बाद लीग का भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान गायब क्यों कर दिया गया ? भारत में खिलाफत आंदोलन को सांप्रदायिक आन्दोलन कहते हुए जिन्ना ने गाँधी को इस आंदोलन को समर्थन नही देने का सुझाव दिया था

 जिसको गाँधी ने हाकिम अजमल खान के प्रभाव में मानाने से इंकार कर दिया था इस तथ्य को भारत के इतिहास से क्यों हटाया गया ? वीर सावरकर की एक चिट्ठी मात्र से उनके भारत के लिए किए गए बलिदान और दोहरे आजीवन कारावास हेतु काले पानी की सजा को इतिहास के पन्नों से मिटाकर उन्हें देशद्रोही और अंग्रेजी शासन का भक्त कहने वाले यह इतिहासकार इस बात का कोई भी सबूत देने से पीछे हट जाते हैं

कि मोहनदास करमचंद गांधी ने एक गुजराती व्यापारी के मुकदमे को छोड़कर अपने जीवन में ऐसे कौन से मुकदमे अंग्रेजी शासन से भारतीयों के लिए जीते थे जिससे उनकी प्रसिद्धि पूरे भारत में पहूंच गई? मसलन जहां तक तथ्यों की बात है उस समय तक ना तो आज की तरह सोशल मीडिया था, ना टीवी समाचार चैनल था और ना ही देश की साक्षरता दर इतनी थी

कि उस समय अंग्रेजी और हिंदी में लिखें जा रहे पत्रिकाओं को आम जनमानस पढ़ सकें फिर अफ्रीका से लौटने से पहले ही गांधी पूरे भारत में एक नायक के रूप स्थापित कैसे हो गए। यदि गांधी ने देश की भौगोलिक सीमाओं से दूर अफ्रीका में अंग्रेजी शासन को पराजित किया था तो फिर ऐसे समय में जब प्रथम विश्व युद्ध में कांग्रेस और बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्ट्रीय नेता भारतीयों को विश्व युद्ध में शामिल करने के विरुद्ध थे और इस मौके को भारत को आजाद कराने के अवसर के रूप में देख रहे थे ठीक उसी समय में गोपाल कृष्ण गोखले के सहयोग से मोहन दास करमचंद गांधी भारतीय युवाओं को अंग्रेजी सेना में शामिल होने के लिए अभियान चला रहे थे

 और लोगों को अंग्रेजी शासन को मदद करने की अपील कर रहे थे । उनके इस सेवा से प्रसन्न होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें “सार्जेंट आफ इंडिया” की उपाधि दी जिसको गांधी ने सहर्ष स्वीकार किया। क्या किसी इतिहासकार ने देश को यह बताया कि गांधी ने अंग्रेजी शासन का साथ देकर एवं उनका सेनानायक बनने की उपाधि लेकर कौन सा देशहित का काम किया था? क्या किसी इतिहासकार ने यह लिखा कि हिन्दू परिवारों की लाशों पर खड़े होकर हिन्दू जमींदारों के घरों की महिलाओं और लड़कियों का बलात्कार कर खड़ा किया गया मालाबार का मोपला विद्रोह जिसका नारा था

 कि "हम केवल और केवल ब्रिटिश महारानी की रैयत रहना चाहते हैं" जिसको अंग्रेजी शासन सहयोग कर रहा था उसे गांधी और कांग्रेस ने समर्थन देकर कौन सा देशहित का कार्य किया था और गाँधी की अहिंसा की नीति इस हिंसात्मक विरोध पर मौन क्यों थी जबकि चौरी-चौरा की घटना जिसमे अग्रेजी थाने पर भीड़ के हमले का बहाना लेकर उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया ? खिलाफत आंदोलन जोकि एक हिंसक अन्दोलान था

उसको गाँधी ने किस अहिंसा की नीति के तहत समर्थन दिया ? क्या गाँधी की अहिंसा की नीति में हिन्दुओं की हत्याओं का कोई मोल नही था? गाँधी कैसे लोकतान्त्रिक नेता थे जिसने दो तिहाई बहुमत से जीते हुए सुभाष चन्द्र बोष को इस्तीफा देने के लिए केवल इसलिए मजबूर कर दिया क्योकि उनका समर्थित उम्मीदवार बुरी तरह हार गया? ऐसे अनेकानेक घटनाएं हैं जिनके रहस्योद्घाटन का समय आ गया है और उसे किसी भी प्रकार के गिरोह बंद विरोध से रोका नहीं जा सकता। देश की वर्तमान एवं आने वाली पीढ़ी को यह जानने का पूरा अधिकार है कि जिनको हम देश का बड़ा इतिहासकार मानते आ रहे हैं

 वह वास्तव में वह कितने बड़े राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा रहे है जिन्होंने देश की जनता को गुमराह करने के लिए भारत के भ्रामक इतिहास लेखन का कार्य किया है।

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