हिन्दी कविताओं में नारी शौर्य की गाथाएं

Notification

×

All labels

All Category

All labels

हिन्दी कविताओं में नारी शौर्य की गाथाएं

Wednesday, February 21, 2024 | February 21, 2024 Last Updated 2024-02-21T12:41:28Z
    Share
हिन्दी कविताओं में नारी शौर्य की गाथाएं

गाथाएं जिन पर लिखे त्याग, बलिदान के पृष्ठ इतिहास के ,वे अमर हो गये।काल के गर्त में वे दफन न हुए ,बन के ज्वाला हृदय में धधकते रहे।।मेरी स्वरचित ये पंक्तियां उद् घोषणा करती हैं


 कि इतिहास के पृष्ठों पर शौर्य गाथाएं स्वर्णिम अक्षरों में अंकित होती है तथा वे सदैव मानव हृदयों में देशप्रेम व राष्ट्र भक्ति के भावों को उद् दीप्त करने का कार्य करती है।नारी को वात्सल्य, ममता,दया,प्रेम,करुणा,उदारता की खान माना जाता है


किन्तु उसके अदम्य साहस,त्याग,बलिदान और वीरोचित गुणों की ओर हमारी दृष्टि नहीं जाती।अपनी अस्मिता,पवित्रता और सतीत्व की रक्षार्थ नारियों ने जौहर का संकल्प लिया।काव्य में नारी की शौर्य गाथाएं वीर गाथा काल से आधुनिक काल तक यत्र -तत्र दृष्टिगोचर होती हैं


 जो हमारे तन को रोमांचित व मन को उद्वेलित कर देश हित हेतु सर्वस्व समर्पण के भाव जाग्रत करती हैं।वीरगाथाकालीन साहित्य में नारियां वीर पुरुष को पति और पुत्र रुप में चाहती थी।नारी का वीर रुप इन पंक्तियों में दृष्टव्य है - भल्ला हुआ जो मारिया बहिनि हमारा किंतु,लज्जेजं तु क्यांसि अहु जै


 भग्गा धरुएंतु।(हे बहिन!भला हुआ जो मेरा पति युद्ध में मारा गया यदि वह भागकर आ जाता तो मुझे सखियों के सामने लज्जित होना पड़ता)मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य के कवि लाल,मान,जटमल और सूदन के काव्य में नारी के वीर तेजस्वी रुप के दर्शन होते हैं।


जटमल के "गोरा बादल कथा" की पद्मिनी एक वीर नारी है जो मर्यादा की रक्षा और वंश के सम्मान हेतु अपने पति से प्राणों के मूल्य पर करने हेतु विनय करती है--"तजिए पीव प्रान,अवर को नार न दीजै,काल न छोडै कोई सीस,दै जग जस लीजै।मत कलंक लगावो आपको,भो सत खो बेजान,कहै राणि पदमावती रतनसेन राजान।"


आधुनिक काल में वीर रस की प्रख्यात कवयित्री द्वारा रचित"झांसी की रानी" शौर्य गीत भारतीय इतिहास में सदा के लिए स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो गया क्योंकि यह गीत राष्ट्रीय भावनाओं को उद्दीप्त करने में सफल सिद्ध हुआ--सिंहासन हिल उठे,राजवंशों ने भृकुटी तानी थी।बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी


गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी।दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। कवयित्री का यह गीत, स्वयं में गीत से अधिक वीरगाथा की सच्ची कहानी है

जिसमें सुभद्रा जी ने रानी लक्ष्मीबाई के जीवन के सारे घटनाक्रम को एक पद्यात्मक रुप में सजीवता से प्रस्तुत किया है जिसे सुनकर या पढ़कर व्यक्ति वीररस से भावविभोर हो उठता है।भारतेन्दु जी ने भी नारी के शौर्य की प्रशंसा करते हुए कहा है--स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,प्रियतम को प्राणों के पण में,हमीं भेज देती हैं रण में,


क्षात्र धर्म के नाते।पं.सोहन लाल द्विवेदी का विचार है कि नारियों में भी पुरुषों के समान स्वाधीनता की भावना कूटकूट कर भरी हुई है और इसी भाव को 'सिपाहिनी' कविता में उद्घाटित करते हैं जिसमें एक नववधू अपने पति को योद्धा जैसा श्रृंगार करने की अपनी इच्छा व्यक्त करती है

चूड़ियां बहुत हुई कलाइयों पर,प्यारे,भुजदण्ड सजा दो,तीर-कमानों से सिंगार दो,जरा जिराह बखतर पहना दो।द्विवेदी जी द्वारा रचित वासवदत्ता की "सरदार चूड़ावत" कविता विशेष रुप से उल्लेखनीय है जिसमें सरदार चूड़ावत की सुन्दर युवा पत्नी,


पति की युद्ध विमुखता और कामातुरता मिटाने के लिए अपना सिर काटकर उपहार स्वरूप उसके पास भिजवाती है--हल्दी का चढा़ था रंग,जिन पाणि पल्लव में सुरंग,उन्हीं अरुण हाथों से लेकर तलवार तीक्ष्ण,रानी ने, निज सिर को किया छिन्न,धड़ से उसे किया भिन्न,दिया उसे हाथ में,अनुचर के साथ में। यहां क्षत्राणी का विश्व हित की कामना से निजी काम -वासनाओं को तिलांजलि देने का उदात्त उदाहरण दृष्टिगोचर होता है।


कवि दीन जी वीरांगनाओं का गुणगान करते हुए कहते हैं--धन्य -धन्य! भारत क्षत्राणी!सुयश तुम्हारा गाता हूंँ ।फिर भारत में वीर नारियां जन्मैं यही मनाता हूँ।वीर नारियां माता बन -बन वीर पुत्र उपजावैंगी।तब भारत की सब विपत्तियां दुम दबाय भग जावैंगी। हरि औध जी ने प्रिय प्रवास में राधा के माध्यम से जगहित के लिए प्रियतम से विछोह को सहन करने की भावना को उद्घाटित किया है जो नारी के त्याग -बलिदान को रेखांकित करता है--प्यारे जीवे जग हित करें गेह चाहें न आवै।


कवि नरेन्द्र शर्मा की दृष्टि में नारी जीवनी शक्ति है।"द्रोपदी "में कवि ने भारतीय नारी के तेज-बल का गायन किया है।राष्ट्रीय चेतना के कवि पं.श्याम नारायण पाण्डेय ‌ ने हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप की पत्नी के माध्यम से स्वतंत्रता की अलख जगाने का नारियों का आवाह्न किया हैं

-थक गया समर से तो अब रक्षा का भार मुझे दे।मैं चण्डी सी बन जाऊं,अपनी तलवार मुझे दे।। जौहर में कवि नारी के कोमल और रौद्र दोनों रुपों का अत्यंत हृदयस्पर्शी चित्र रेखांकित करता है--हिममाला है पर ज्वाला भी,लक्ष्मी है पर काली भी।दो डग चलना दुर्लभ, पर अवसर पर रण मतवाली भी।हिन्दी कविताओं में नारी त्याग, तपस्या,

 बलिदान की अधिष्ठात्री है।उसकी शौर्य -गाथाएं युगों-युगों तक मानव हृदय में राष्ट्र भक्ति की भावना का संचरण करती रहेंगी।मेरा विचार है --"पुरुष ने शौर्य के इतिहास लिक्खे,नारियां भी वीरता में कम नहीं हैं।" 

                 लेखक डा.चन्द्रप्रकाशशर्मा, सलाहकार हिन्दी, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, भारत सरकार निवास -नसीराबाद, मिलक,रामपुर (उ.प्र. )
CLOSE ADS
CLOSE ADS
close