एटा कोतवाली नगर दरोगा विजेन्द्र सिंह सहित नौ पुलिस कर्मियों पर एफआईआर दर्ज का कोर्ट ने दिया आदेश
खुद की जीडी में खुद के खिलाफ लिखेगी एफआईआर
एटा -156/3 के तहत मामला मा0 न्यायालय में चुनौती देने खाकी पर दर्ज होने वावत पहुंचा तो खाकी के होश ठिकाने आ गये है, जो पुलिस सूर्य अस्त पुलिस मस्त में जीवन शैली चला रही है, निर्दोषों को फर्जी गुण्डा बनाने में लगी रहती है,
गुण्डे को कभी छूती भी नही है, फर्जी 3 यूपी गुण्डा एक्ट सन् 2020 लगाया फिर सन् 2022 लगाया जो मजिस्ट्रेट ने खत्म कर दिया है, लेकिन एचएस 142ए/2024 खोल कर साबित कर दिया है,
पुलिस मुखिया केवल कर्मचारी की वावत काम करते है,कभी बेगुनाहो की नही सुनते हैं, फिलहाल एचएस पुलिस के को0 नगर के एचएम ने पांच लाख रुपए लेकर पुटअप की जो कोतवाल से होती हुई,
क्षेत्राधिकारी नगर के माध्यम से अग्रसारित हो कर पुलिस मुखिया ने स्वीकृति दी, और फिर एचएस जारी हुई है, पुलिस मुखिया को कई सबूत दिए जिसमें मा0 न्यायालय के दोष मुक्त आदेश जिसके तहत बाद सभी समाप्त है,अब लगता है, हाईकोर्ट में पुलिस मुखिया को ही पार्टी बना लू,
कोर्ट न हो तो आदमी पुलिस को घूस देकर खा जाएगा
आदमी आदमी को खा जाए अगर अदालत न हो तो पुलिस तो सूर्य अस्त पुलिस मस्त के फार्मूले में चल रही है, पुलिस परीक्षा देने आए अभियार्थी को ही पार्टी बना डाला और हवा लात में विजेन्द्र सिंह दरोगा एवं अन्य दरोगा तथा पुलिस कर्मियों सहित लात घूसों की बोछार कर दी है,
बादी ने संविधान विशेषज्ञ की सलाह ली और कोर्ट की शरण ली, जिसमें 156/3 में कोर्ट ने कोतवाली नगर में पूर्व में इंस्पेक्टर रहे थे,जिनको आम जनता में डकैत की संज्ञा दी जाती है, उनके सादिग्ध में लीन रहे दरोगा विजेन्द्र सिंह सहित अन्य दरोगा तथा पुलिस कर्मियों को मिला कर आदा दर्जन हो जाते है,
मैं कांडा तूं कांडा
कोर्ट के आदेश का कोतवाली नगर पालन करते हुए,मा0 न्यायालय के आदेश के बाबत एफआईआर दर्ज कर लेगी, लेकिन सवाल यह है,
जांच तो पुलिस करेगी जांच अधिकारी अपने पुलिस साथियों को बचाने के बाबत एफआईआर में एफआर लगाने की फिराक में शुरू बात हो जाएंगी,जब सिविल पावर पुलिस के हाथ है, तो पुलिस तो सूर्य अस्त पुलिस मस्त के फार्मूले के साथ प्रयोग करेगी,
अब मा0 न्यायालय को पुलिस प्रकरण में एफआईआर में जांच आई0बी0/एल0आई0यू0/एसटीएफ/एटीएफ/सीबीआई जांच एजेंसियों से करानी चाहिए,बैसे भी कोर्ट में चार लाख प्लश फाइल पैन्डिग है,
तो पुलिस के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने पर एफआर लगाने पर प्रोटेस्ट पिटीशन में बादी को आना पड़ता है, डरपोकों का हाल पुलिस के नाम से रोंगटे खड़े हो जाते है, लेकिन इतनी लंबी लड़ाई लड़ना न्यायालय पालिका से न्याय ले पाना मुश्किल हो जाता है,
लम्बी लड़ाई में बादी के मर जाने पर मुकदमा खत्म हो जाता है,बादी के लिखने वोलने की क्षमता खत्म होने पर बाद खत्म हो जाता है, इसलिए आतंक वादी भारत के कोर्ट में अपना केश स्थानांतरित कराने में लग जाते है,
पुलिस के होश ठिकाने लगा देने का आदेश
पुलिस मुखिया को यह समझ लेना चाहिए कि बुलडोजर चला कर कानून व्यवस्था नही चलती है,न ही सक के आधार पर किसी को एचएम आदि पुलिस कर्मियों की आख्या रिपोर्ट पर कार्यवाही से काम चलता है,
कानून व्यवस्था संविधान से चलती है, चंद सवालों में उलझे रह जाते वो तीस मार खा पुलिस कर्मियों को जो संरक्षण देने का समर्थन करते है,