कैसे तैयार होता है देश् का आम् बजट किन बातो का रखा जाता है ध्यान

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कैसे तैयार होता है देश् का आम् बजट किन बातो का रखा जाता है ध्यान

Friday, June 21, 2024 | June 21, 2024 Last Updated 2024-06-22T04:27:29Z
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कैसे तैयार होता है देश् का आम् बजट किन बातो का रखा जाता है ध्यान

संबाददाता आकाश बाबू


नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जुलाई के तीसरे हफ्ते में Modi 3.0 का पहला आम बजट पेश करेंगी। यह उनका लगातार छठा पूर्ण बजट होगा। इसके साथ ही वह मोरारजी देसाई का रिकॉर्ड तोड़कर लगातार सबसे अधिक बार पूर्ण बजट पेश करने वाली वित्त मंत्री बन जाएंगी।

हालांकि, अभी ओवरऑल रिकॉर्ड मोरारजी देसाई के ही नाम रहेगा, जिन्होंने कुल 10 बजट पेश किए थे।

आइए जानते हैं कि बजट तैयार कैसे होता है और इसे तैयार करते वक्त किन बातों का ध्यान रखा जाता है। बजट तैयार कर रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को किसी से मिलने जुलने की इजाजत क्यों नहीं होती।

साथ ही, देश के बजट से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्यों के बारे में भी जानेंगे
अगर कम शब्दों में कहें, तो आम बजट वैसा ही है, जैसे कि हम अपने घरेलू खर्चों के लिए बजट बनाते हैं। हमारी जितनी कमाई होती है, उसी के हिसाब से हम अपने खर्च के लिए योजना बनाते हैं।


 मतलब कि बच्चों की पढ़ाई, EMI, शॉपिंग और दवाओं पर कितना खर्च होगा। अगर हमारी कमाई कम या ज्यादा होती है, तो हम उसी हिसाब से कर्ज लेने या फिर निवेश करने की योजना बनाते हैं। बजट में भी कमोबेश यही चीजें होती हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर।

संविधान के अनुच्छेद 112 के मुताबिक, केंद्र सरकार के किसी एक साल का वित्तीय ब्यौरा संघीय या आम बजट होता है। इसे केंद्र सरकार को हर साल पेश करना होता है। इससे पता चलता है कि सरकार को सालभर में कुल स्रोतों से कितना राजस्व मिला है और कुल कितनी रकम खर्च की गई है।

बजट से यह जानकारी भी मिलती है कि अगले वित्त वर्ष के लिए सरकार की योजनाएं क्या हैं। वह किस योजना पर कितना खर्च करेगी और किन तरीकों से उसका राजस्व बढ़ेगा या घटेगा। इन सबसे कुल मिलाकर देश की वित्तीय हैसियत का अंदाजा मिलता है कि वह अपने राजस्व के हिसाब से खर्चों को किस हद तक बढ़ा सकता है।


बजट बनने की शुरुआत कैसे होती है?
देश के बजट का आधार होती है, नॉमिनल जीडीपी। यह देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की मौजूदा बाजार कीमत होती है। इसी के आधार पर राजकोषीय घाटे से लेकर सरकार की आमदनी और खर्च तक की बात पता चलती है। बजट पेश करने की प्रक्रिया (Union Budget process) की बात करें, तो इसकी शुरुआत तकरीबन 6 महीना पहले से हो जाती है।

सरकार अलग-अलग प्रशासनिक निकायों से आंकड़े मांगती है, ताकि उसे पता चल सके कि किस विभाग को कितने फंड की जरूरत है। इसी से सरकार को यह भी अंदाजा होता है कि आयुष्मान भारत और स्वच्छ भारत जैसी जनकल्याण योजनाओं पर कितनी रकम खर्च करनी है। फिर उसी हिसाब से अलग-अलग मंत्रालयों के लिए फंड का बंदोबस्त किया जाता है।

बजट बनाने में किन लोगों की भूमिका रहती है?
बजट बनाने का सारा काम वित्त मंत्री की देखरेख में होता है। लेकिन, वित्त सचिव, राजस्व सचिव और व्यय सचिव की भूमिका भी काफी अहम होती है। उनकी बजट के सिलसिले में वित्त मंत्री से हर रोज बातचीत या मीटिंग होती है। अमूमन, वित्त मंत्रालय में या फिर वित्त मंत्री के आवास में। बजट बनाने वाली टीम को वित्त मंत्री के साथ प्रधानमंत्री और नीति आयोग का भी पूरा सहयोग मिलता है।

बजट टीम में अलग-अलग क्षेत्र के एक्सपर्ट भी होते हैं, जो बताते हैं कि सरकार को किस क्षेत्र पर फोकस बढ़ाना चाहिए। वित्त मंत्री बजट पेश करने से पहले तमाम उद्योग प्रतिनिधियों और संगठन के लोगों से भी सलाह मशविरा करते हैं और उसी हिसाब से नीतियां तैयार करने की कोशिश की जाती है। बजट पेश करने से पहले डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स को भी अंतिम रूप दिया जाता है।

बजट में किस तरह की जानकारियां दी जाती हैं?
सरकार बजट में अपने राजस्व और खर्च की पूरी जानकारी देती है। जैसे कि जनकल्याण योजनाओं को कितना फंड दिया जा रहा, आयात पर कितनी रकम खर्च हो रही। सरकारी कर्मचारियों को वेतन पर कितना खर्च हो रहा, सेना की कैसे फंडिंग हो रही है। सबसे बड़ी बात कि सरकार ने जो कर्ज लिया है, उसके ब्याज में कितना पैसा जा रहा है।
वहीं, राजस्व की बात करें तो इसमें सरकार टैक्स और गैर-टैक्स स्रोत से मिली रकम की जानकारी देती है। सरकार टैक्स लगाने के अलावा सरकारी कंपनियों से कमाई करती है, साथ ही बॉन्ड जारी कर राजस्व जुटाती है। विनिवेश (Disinvestment) यानी सरकारी कंपनियों या संपत्तियों में हिस्सेदारी बेचना भी सरकार की आमदनी का एक जरिया होता है।

अगर सरकार का खर्च उसके राजस्व से अधिक हो जाता है, तो इसे बजट घाटा कहते हैं। इस सूरत में सरकार अपनी आमदनी स्रोतों को बढ़ाने की कोशिश करती है, जैसे कि टैक्स या ड्यूटी बढ़ाना। वहीं, कुछ खर्चों में कटौती भी की जाती है, जिसे सरकार गैरजरूरी समझती है। बजट को नियंत्रित करने के लिए सरकार कई बार अतिरिक्त नोट छापने का भी फैसला करती है, जिससे महंगाई का खतरा बढ़ जाता है।
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