निष्पक्ष न्याय अभियान के अंतर्गत जीएसटी वार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं ने किया मौन प्रदर्शन
नेशनल 24 लाइव न्यूज़ जनपद बरेली
कल, दि उत्तर प्रदेश टैक्स बार एसोसिएशन (UPTBA) के आह्वान पर कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका (अपीलीय अधिकारी) की स्वतंत्रता एवं न्यायिक अनुशासन में किए जा रहे अनधिकृत हस्तक्षेप एवं अतिक्रमण के विरुद्ध कर अधिवक्ताओं द्वारा मौन प्रदर्शन किया गया।
कार्यपालिका द्वारा न्यायिक प्रक्रिया में बढ़ता हुआ हस्तक्षेप न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को खतरे में डाल रहा है। विशेष रूप से, अपीलीय अधिकारियों पर अपीलों को फास्ट ट्रैक मोड (खटाखट) पर निपटाने का दबाव डाला जा रहा है,
जिसमें उचित सुनवाई का अवसर प्रदान किए बिना निर्णय लेने की मांग की जा रही है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि अपीलीय अधिकारियों पर राजस्व के पक्ष में निर्णय देने का दबाव बनाया जा रहा है,
जो न्यायिक निष्पक्षता के मूल सिद्धांत का उल्लंघन है। इस प्रवृत्ति को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन के लिए गंभीर खतरा है।
जोनल चेयरमैन एडवोकट राजीव अग्रवाल और कार्यकारिणी सदस्य एडवोकट गोपेश कुमार शर्मा के नेतृत्व में टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एड.
योगेश बंसल, सचिव एड. विजय मौर्य, बरेली टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एड. संजीव चतुर्वेदी, सचिव एड. शिव नरेश व जीएसटी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एड. विवेक तायल, सचिव एड. अमित अग्रवाल के साथ समस्त सदस्य अधिवक्ताओं ने एक शांति मार्च निकाला।
प्रदर्शनकारियों ने अपनी बाँह पर काला बैंड एवं मुंह पर सफेद पट्टी बाँधकर अपना विरोध प्रकट किया। मार्च अपीलीय अधिकारी के कार्यालय तक पहुंचा, जहाँ एडिशनल कमिश्नर ग्रेड 2 (अपील) को विरोध पत्र सौंपा गया। इस दौरान, विरोध स्वरूप दो मिनट का मौन भी रखा गया।
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में टैक्स बार एसोसिएशन, बरेली टैक्स बार एसोसिएशन व जीएसटी बार एसोसिएशन के समस्त पदाधिकारी व सदस्य अधिवक्तागण उपस्थित रहे। यह कार्यक्रम न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति UPTBA की प्रतिबद्धता का एक स्पष्ट संकेत है।
UPTBA कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को बनाए रखने और न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी अनुचित हस्तक्षेप का विरोध करने के लिए दृढ़ संकल्पित है। संगठन का मानना है
कि न्याय प्रक्रिया में जल्दबाजी और पक्षपातपूर्ण निर्णय न केवल व्यक्तिगत मामलों में अन्याय का कारण बन सकते हैं, बल्कि समग्र न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर सकते हैं।