सहसवान में 'खाकी' की नाक के नीचे से नाबालिग पार, 30 दिन से पुलिस नहीं लगापाई कोई सुराग

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सहसवान में 'खाकी' की नाक के नीचे से नाबालिग पार, 30 दिन से पुलिस नहीं लगापाई कोई सुराग

Sunday, March 8, 2026 | March 08, 2026 Last Updated 2026-03-08T09:29:04Z
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सहसवान में 'खाकी' की नाक के नीचे से नाबालिग पार, 30 दिन से पुलिस नहीं लगापाई कोई सुराग

बदायूं (सहसवान): यूपी पुलिस का नारा है— 'सुरक्षा आपकी, संकल्प हमारा', लेकिन सहसवान कोतवाली में यह नारा शायद बदलकर 'फुर्सत हमारी, किस्मत आपकी' हो गया है। एक लाचार पिता पिछले 30 दिनों से अपनी 16 वर्षीय कलेजे के टुकड़े (नाबालिग पुत्री) के लिए थाने की चौखट घिस रहा है, रो-रोकर उसकी आँखें पथरा गई हैं, लेकिन साहब हैं कि 'फाइल' दबाए कुंभकर्णी नींद में मस्त हैं।

*अजब-गजब पुलिस* 'हाईटेक' जमाने में 'लालटेन' लेकर ढूंढ रही सुराग।
हैरानी की बात है कि 5 फरवरी को मोहल्ले के ही नामजद सुनील दत्त और उसकी पूरी 'मंडली' एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर रफूचक्कर हो गई। घर से नगदी और जेवर भी साफ हो गए। पुलिस ने FIR नंबर 0065 दर्ज कर अपनी पीठ तो थपथपा ली, लेकिन हकीकत यह है 

कि एक महीना बीत जाने के बाद भी खाकी के हाथ 'खाली' के खाली हैं। सवाल उठता है कि क्या यूपी पुलिस का 'सर्विलांस' और 'इंटेलिजेंस' सिर्फ वीआईपी मामलों के लिए ही एक्टिव होता है? या फिर गरीब की बेटी के लिए पुलिस का 'जीपीएस' काम करना बंद कर देता है?

बिलखता पिता और पुलिस का 'ठंडा' रवैया
कोतवाली परिसर में उस बेबस पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। वह हर आने-जाने वाले सिपाही के आगे हाथ जोड़ता है, पैरों में गिरता है, लेकिन वहां से उसे सिर्फ 'जांच चल रही है' का ठंडा और बासी जवाब मिलता है। आरोपी दबंगई दिखाते रहे,

 धमकियां देते रहे, और फिर गायब हो गए—लेकिन हमारी जांबाज पुलिस शायद उनके लिए 'रेड कार्पेट' बिछाने का इंतजार कर रही थी।

साहब, चश्मा उतारिए! क्या 30 दिन का समय एक अपराधी को पकड़ने के लिए कम होता है? या फिर 'खास' सेटिंग ने हाथ बांध रखे हैं?
नामजद आरोपी फरार, पुलिस 'साइकिल' पर सवार? जब आरोपियों के नाम और पते साफ हैं, तो पुलिस का 'दबिश' वाला नाटक कब खत्म होगा?

*खाकी पर दाग* क्या सहसवान पुलिस सिर्फ चालान काटने और कागजी घोड़े दौड़ाने के लिए रह गई है?
*चर्चा है कि...*
नगर की गलियों में चर्चा आम है कि अगर पुलिस चाहती तो अब तक पाताल से भी आरोपियों को खींच लाती। लेकिन यहाँ तो मामला 'ठंडे बस्ते' का लग रहा है।

 साहब, याद रहे... जब जनता का सब्र टूटता है, तो फिर 'स्पष्टीकरण' देने का भी मौका नहीं मिलता।
*चेतावनी* कप्तान साहब! जरा सहसवान की ओर निगाह-ए-करम फरमाइए, वरना एक बेबस पिता की आह कहीं आपकी 'साख' को स्वाहा न कर दे।
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