शिक्षा सामग्री खरीद पर आखिर कब तक होगी स्कूल और दुकानदारों की मनमानी ?
नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही अभिभावकों की जेब पर डाका डालने का खेल एक बार फिर शुरू हो गया है। सरकारी दावों और निर्देशों के बावजूद, निजी स्कूलों और चुनिंदा दुकानदारों की 'जुगलबंदी' अभिभावकों के लिए जी का जंजाल बनी हुई है। सवाल यही उठता है कि आखिर कब तक शिक्षा के नाम पर यह मनमानी जारी रहेगी?
कमीशन का खेल: चुनिंदा दुकानों से ही खरीद की मजबूरी
शहर के अधिकांश नामी निजी स्कूलों ने किताबों और यूनिफॉर्म के लिए कुछ खास दुकानों को "अधिकृत" कर दिया है। अभिभावकों का आरोप है कि इन दुकानों पर सामग्री की कीमतें बाजार भाव से 30% से 50% तक अधिक होती हैं।
इस साल कागज की कीमतों में वृद्धि का हवाला देकर निजी प्रकाशकों ने किताबों के दाम 20% तक बढ़ा दिए हैं। एनसीईआरटी (NCERT) की सस्ती किताबों के बजाय निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें थोपी जा रही हैं।
नियम ताक पर, प्रशासन मौन?
शिक्षा विभाग के स्पष्ट निर्देश हैं कि कोई भी स्कूल किसी खास दुकान से सामग्री खरीदने के लिए दबाव नहीं बना सकता।
"प्रशासन हर साल आदेश तो जारी करता है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं होती। स्कूलों और दुकानदारों का यह नेक्सस इतना मजबूत है कि आम आदमी सिर्फ पिस कर रह जाता है।"
— एक पीड़ित अभिभावक
क्या हो सकता है समाधान?
विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि इस मनमानी को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे:
कठोर दंड: नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द करने जैसी कार्रवाई हो।
ओपन मार्केट पॉलिसी: स्कूल की ड्रेस और किताबें शहर की कम से कम 5-10 प्रमुख दुकानों पर उपलब्ध होनी चाहिए।
एनसीईआरटी अनिवार्य हो: सभी निजी स्कूलों में प्राथमिक स्तर से ही केवल एनसीईआरटी या सरकारी मान्यता प्राप्त सस्ती किताबें ही लागू की जाएं।
निष्कर्ष:
शिक्षा कोई व्यापार नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। यदि प्रशासन और सरकार ने समय रहते इन "शिक्षा माफियाओं" पर नकेल नहीं कसी, तो आम आदमी के लिए अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना केवल एक सपना बनकर रह जाएगा।