चराग़-ए-सुख़न के मासिक तरही मुशायरे में शायरों ने पढ़े उम्दा कलाम, खूब मिली दाद
बदायूँ। बज़्म चराग-ए सुखन द्वारा संस्था के सोथा मोहल्ला स्थित कार्यालय फरशोरी हाउस पर मासिक तरही मुशायरे का आयोजन किया गया।मिसरा तरह था "अभी मौसम में थोड़ी सी नमी है।" जिसमें शायरों ने बेहतरीन तरही कलाम सुनाकर खूब वाहवाही लूटकर समां बांध दिया।
मुशायरे की सदारत मशहूर वरिष्ठ उस्ताद शायर डॉ मुजाहिद नाज़ बदायूंनी ने की। निजामत वरिष्ठ शायर सुरेंद्र नाज़ ने की।
शाकिर रज़ा बदायूंनी ने नात-ए-पाक पढ़कर नशिस्त का आगाज किया उन्होंने कहा -
नबी के नाम की तख्ती लगी है,
इसी बाइस तो घर में रोशनी है।
सदारत कर रहे वरिष्ठ शायर डॉ मुजाहिद नाज़ बदायूंनी ने बेहतरीन शायरी पेश की कहा-
शमा उम्मीद की यूं जल रही है।
गुमा होता है जैसे बुझ रही है।।
निजामत कर रहे सुरेन्द्र नाज़ ने तालियों के बीच ग़ज़ल सुनाई -
हिकारत से जो दुनिया देखती है,
तिरे किरदार में कुछ तो कमी है।
सादिक अलापुरी ने बेहतरीन शेर पढ़े-
जो दुनिया खूबसूरत दिख रही है,
ये सब कुदरत की ही कारीगरी है।
शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने अपने कलाम के ज़रिए श्रोताओं का दिल जीत लिया,कहा -
तिरा हर ग़म है मेरा ग़म प्यारे,
तिरी हर इक खुशी मेरी खुशी है।
अल्हाज आज़म फरशोरी की ये पंक्तियां खूब पसंद की गईं-
लबों पर तो यहाँ सबके हँसी है
मगर अंदर अजब सी बेकली है।
डॉ दानिश बदायूंनी ने कहा कि -
भरी रहती थी फूलों से हमेशा,
ये पगडंडी जो कांटों से भरी है।
अरशद रसूल ने ग़ज़ल पढ़ी -
मैं रिश्तों की हिफाजत कर रहा हूं,
कलाई पर मेरी राखी बंधी है।
युवा शायर उज्ज्वल वशिष्ठ ने तरन्नुम से पढ़ा-
सड़क पर लाश इक तन्हा पड़ी है,
बड़े शहरों में कितनी बेहिसी है।
इसके अलावा शहाबुद्दीन शब्बू भाई, अल्हाज सालिम फरशोरी ,हसन रज़ा आदि श्रोतागण मौजूद रहे। आखिर में कार्यक्रम संयोजक सुरेन्द्र कुमार नाज़ ने सभी मेहमानों का शुक्रिया अदा किया।
शमसुद्दीन शम्स ने बताया कि अगला तरही मुशायरा उज्ज्वल वशिष्ठ के संयोजन में 14 जून को होगा जिसका मिसरा है -
"हमारे नाम का इक दूसरा है"