कॉकरोच जनता पार्टी” और सोशल मीडिया की भीड़चाल।
युवाओं को सजग रहने की आवश्यकता: सम्भव जैन
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वर्तमान समय में सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह जनमत निर्माण, नैरेटिव तैयार करने और युवाओं की मानसिक दिशा को प्रभावित करने का अत्यंत शक्तिशाली साधन बन चुका है। आजकल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” भी इसी प्रकार की एक चर्चा का विषय बनी हुई है।
विशेष रूप से Gen Z और युवा वर्ग के बीच इसे एक “डिजिटल फोर्स” अथवा नई राजनीतिक सोच के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके बढ़ते फॉलोअर्स और वायरल अभियानों को देखकर अनेक युवा बिना गहराई से समझे इससे जुड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं।
किन्तु किसी भी सोशल मीडिया अभियान या राजनीतिक नैरेटिव को समझने से पूर्व उसका गहन अध्ययन और तथ्यात्मक परीक्षण अत्यंत आवश्यक है। केवल वायरल वीडियो, ट्रेंडिंग पोस्ट, आक्रामक भाषण या बड़े फॉलोअर्स देखकर किसी विचारधारा अथवा समूह के समर्थन में खड़ा हो जाना युवाओं की सजगता का नहीं, बल्कि भीड़चाल का प्रतीक बन सकता है।
आज साइबर युग में “फॉलोअर्स” को ही “समर्थन” मान लेने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति या पेज को फॉलो करने का अर्थ यह नहीं होता कि हर फॉलोअर उसका समर्थक, शुभचिंतक या वोटर है। अनेक लोग केवल जानकारी प्राप्त करने, विरोधी विचारों को समझने अथवा उसके द्वारा डाले जा रहे कंटेंट पर निगरानी रखने के उद्देश्य से भी किसी पेज को फॉलो करते हैं। इसलिए फॉलोअर्स की संख्या को जनसमर्थन का प्रमाण मान लेना एक बड़ी भूल और भ्रम है।
युवाओं को यह भी समझना चाहिए कि कोई भी वास्तविक राजनीतिक शक्ति केवल सोशल मीडिया प्रचार से निर्मित नहीं होती। किसी भी पार्टी या संगठन को मजबूत बनने के लिए वैचारिक आधार, राष्ट्रहित का स्पष्ट एजेंडा, संगठनात्मक संरचना, समर्पित कार्यकर्ता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व आवश्यक होता है। केवल मीम, ट्रोलिंग, वायरल रील्स और डिजिटल प्रचार किसी राष्ट्र का भविष्य निर्धारित नहीं कर सकते।
जिस “कॉकरोच” टिप्पणी को आधार बनाकर भावनात्मक नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया गया, उसके वास्तविक संदर्भ और परिस्थितियों को समझना भी आवश्यक है। किसी भी बयान को अधूरा सुनकर या केवल सोशल मीडिया क्लिप देखकर प्रतिक्रिया देना उचित नहीं है। आज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधे-अधूरे तथ्यों और भावनात्मक प्रचार के माध्यम से युवाओं को प्रभावित करने की योजनाबद्ध कोशिशें होती रहती हैं। ऐसे में विवेक, अध्ययन और राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।
भारत का युवा कभी भी परावलंबी मानसिकता वाला नहीं रहा। यह वही देश है जहाँ स्वतंत्रता संग्राम में युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्र को स्वतंत्र कराया। Bhagat Singh, Sukhdev Thapar और Shivaram Rajguru जैसे क्रांतिकारियों ने देश की स्वतंत्रता के लिए हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया था। उस युवा शक्ति का उद्देश्य राष्ट्रनिर्माण था, न कि क्षणिक लोकप्रियता या डिजिटल ट्रेंड।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा वर्ग किसी भी नए सोशल मीडिया अभियान, राजनीतिक ट्रेंड या वायरल नैरेटिव के पीछे आँख मूँदकर न दौड़े। बिना तथ्य, बिना वैचारिक स्पष्टता और बिना राष्ट्रहित के एजेंडे वाले अभियानों से दूरी बनाकर विवेकपूर्ण चिंतन करना ही जागरूक नागरिक का कर्तव्य है।
भारत का युवा अब जागृत है। वह ट्रोल संस्कृति, भ्रमित प्रचार और भीड़ आधारित डिजिटल मानसिकता से ऊपर उठकर राष्ट्रहित, आत्मनिर्भरता और सकारात्मक विचारधारा को अपनाने की क्षमता रखता है। इसलिए युवाओं को चाहिए कि वे किसी भी डिजिटल अभियान का हिस्सा बनने से पहले उसके उद्देश्य, पृष्ठभूमि, विचारधारा और वास्तविक प्रभाव का गंभीर अध्ययन अवश्य करें। यही जागरूकता राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बनेगी।