हेपेटाइटिस-सी का बढ़ा खतरा।

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हेपेटाइटिस-सी का बढ़ा खतरा।

Thursday, April 18, 2024 | April 18, 2024 Last Updated 2024-04-18T09:57:06Z
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सम्भल जनपद में 

हेपेटाइटिस-सी का बढ़ा खतरा।

जिले में हेपेटाइटिस-सी का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसकी चपेट में पुरुषों के साथ ही महिलाएं भी भी आ रही हैं। जिला अस्पताल और पवांसा सीएचसी के


 रिकॉर्ड के अनुसार जिले में हर माह 400 से ज्यादा मरीजों में हेपेटाइटिस सी की पुष्टि हो रही है। खतरनाक बीमारी बढ़ने के कारण अभी तक सामने नहीं आ सके है। जिससे काबू पाया जा सके।

हेपेटाइटिस-सी के मरीज वैसे तो पूरे जिले में सामने आ रहे हैं। लेकिन असमोली ब्लाॅक के गांव बिलालपत और रामनगर गांव सबसे ज्यादा इस बीमारी की चपेट में हैं। दोनों गांवों में सैकड़ों लोग बीमारी से ग्रसित हैं।


 जिनका सरकारी अस्पताल के साथ ही मुरादाबाद और दिल्ली के निजी अस्पतालों में उपचार चल रहा है। वर्तमान में जिला अस्पताल में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्तर के करीब 600 मरीजों को उपचार चल रहा है।

 वहीं पवांसा सीएचसी में 650 से ज्यादा मरीज उपचार करा रहे हैं। जिला अस्पताल में की चिकित्सक डॉ. आंचल मल्होत्रा ने बताया कि हर महीने 180 मरीज तक नए मिल रहे हैं। इन मरीजों में महिला, पुरुष और युवा शामिल है।


बताया कि हेपेटाइटिस सी संक्रमित इंजेक्शन, ब्लेड और खून के कारण होता है। इन मरीजों का खून भी किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता है। पवांसा सीएचसी के प्रभारी डॉ. मनोज कुमार ने बताया कि हेपेटाइटिस के कारण लीवर में दिक्कत होती है।

हेपेटाइटिस के कई कारण हो सकते हैं। इस संक्रमण के कारण जान को खतरा भी हो सकता है।
हेपेटाइटिस की वायरल लोड जांच की सुविधा बढ़ी।

जिले में हेपेटाइटिस के मरीजों की वायरल लोड की जांच भी निशुल्क होती है। इससे पहले मरीजों को वायरल लोड के लिए निजी पैथोलॉजी लैब पर जाना पड़ता था। अब काफी समय से जिला अस्पताल में हेपेटाइटिस मरीजों को सुविधा मिल रही है।



बिलालपत के मरीज निजी अस्पताल में करा रहे उपचार
असमोली ब्लॉक के गांव बिलालपत की आबादी करीब दस हजार है। इसमें 200 से ज्यादा लोगों का उपचार हेपेटाइटिस सी का चल रहा है। ग्राम प्रधान कमर आलम ने बताया कि ज्यादातर मरीजों का उपचार निजी अस्पताल में चल रहा है।



 गांव के लोग बड़ी समस्या से लंबे समय से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया है। जिसके चलते लोग निजी अस्पताल से उपचार कराने के लिए मजबूर हैं। जांच भी निजी लैब पर ही कराते हैं।
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