रोटी की मजबूरी ने छीना बचपन, सड़कों पर दिख रहे बाल श्रमिक।
संवाददाता लेखराज कौशल की रिपोर्ट हापुड़ उत्तर प्रदेश
लेखराज कौशल
हापुड़/बाल श्रम कानूनन अपराध है, लेकिन जिले में यह कड़वी हकीकत अब भी खुलेआम दिखाई दे रही है। शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक कई बच्चे मैकेनिक की दुकानों, जूस सेंटरों, ठेलों और अन्य प्रतिष्ठानों पर काम करते नजर आ रहे हैं। सवाल यह है कि जब यह सब खुलेआम हो रहा है तो जिम्मेदार विभाग की नजर इससे क्यों नहीं पड़ रही।
जिन रास्तों से रोजाना प्रशासनिक और विभागीय अधिकारी गुजरते हैं, वहीं कई स्थानों पर नाबालिग बच्चों से काम कराया जा रहा है। इसके बावजूद प्रभावी रोकथाम नहीं हो पा रही है।
बीते तीन वर्षों में 500 से अधिक बाल मजदूरों को मुक्त कराए जाने के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा।
आर्थिक तंगी और परिवार की मजबूरी के चलते कई बच्चों के हाथों में किताबों की जगह औजार थमा दिए गए हैं।
चंद रुपयों के लिए उनका बचपन मजदूरी की भेंट चढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि गरीबी और जागरूकता की कमी का फायदा उठाकर कुछ लोग बच्चों से श्रम करा रहे हैं, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो रहा है।
सरकार की ओर से बाल श्रम रोकने के लिए शिक्षा का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, सख्त कानून और जनजागरूकता जैसे कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन इनका असर जमीन पर सीमित नजर आता है।
श्रम विभाग के आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में जिलेभर में 121 स्थानों पर निरीक्षण किए गए, जिनमें 125 बाल एवं किशोर श्रमिक चिह्नित किए गए। इस दौरान 21 प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई की गई और 16 पर जुर्माना लगाया गया। हालांकि बच्चों को श्रम से मुक्त कराने के बाद उनके पुनर्वास और बेहतर भविष्य के लिए और ठोस प्रयासों की जरूरत महसूस की जा रही है।
सहायक श्रमायुक्त सर्वेश कुमारी ने बताया कि जिले में बाल श्रम रोकने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है। बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए स्कूलों में दाखिला कराया जा रहा है तथा शासन के नए निर्देशों के तहत आवश्यक लाभ भी दिलाए जा रहे हैं।