बदायूं
ताले में कैद अन्नदाता की उम्मीदें, सिस्टम की बेरुखी से सिसक रहा उसावा
बदायूं के उसावां में बंद पड़ा इफको ई-बाजार केंद्र, खाद के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हजारों किसान
बदायूं/उसावां।
देश की रीढ़ कहे जाने वाले अन्नदाता आज बदायूं के उसावां क्षेत्र में सरकारी व्यवस्थाओं की लापरवाही और तंत्र की उदासीनता का दर्द झेलने को मजबूर हैं।
कभी किसानों के लिए राहत और सहारे का केंद्र माना जाने वाला उसावां बस स्टैंड स्थित इफको ई-बाजार केंद्र आज वीरानी की तस्वीर बन चुका है। बंद शटर पर लटका ताला अब सिर्फ एक दुकान के बंद होने की निशानी नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों की टूटी उम्मीदों और बिखरते भरोसे का प्रतीक बन गया है,
जो अपनी खेती और फसल बचाने के लिए इसी केंद्र पर निर्भर थे।
खरीफ सीजन सिर पर है, खेत तैयार हैं, किसान आसमान की तरफ उम्मीदों से देख रहा है, लेकिन खाद के बिना खेती की गाड़ी पटरी से उतरती दिखाई दे रही है। क्षेत्र के किसानों का कहना है कि पहले गांव के नजदीक ही DAP, यूरिया और अन्य कृषि सामग्री आसानी से मिल जाती थी,
लेकिन अब इफको संस्था द्वारा उसावां केंद्र को बिल्सी केंद्र से संबद्ध कर देने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए हैं। किसानों को कई किलोमीटर दूर भटकना पड़ रहा है, जहां घंटों लाइन में लगने के बावजूद खाद मिलने की कोई गारंटी नहीं रहती।
गांव-गांव में किसान परेशान हैं। कोई ट्रैक्टर में डीजल भरवाकर खाद की तलाश में निकल रहा है
तो कोई किराया खर्च कर बिल्सी तक पहुंच रहा है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह संकट किसी आर्थिक आपदा से कम नहीं माना जा रहा। खेती पहले ही महंगे डीजल, बढ़ती लागत, बिजली संकट और मौसम की मार से कराह रही है, ऊपर से खाद के लिए लंबी दूरी तय करना किसानों की कमर तोड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में खाद की किल्लत और ज्यादा बढ़ सकती है। किसानों को डर है कि समय पर खाद नहीं मिली तो फसल उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा और खेतों में हरियाली की जगह सूखा और नुकसान दिखाई देगा। इलाके में कालाबाजारी और अव्यवस्था का खतरा भी मंडराने लगा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसानों की इस बड़ी समस्या पर स्थानीय जनप्रतिनिधि, किसान नेता और जिम्मेदार अधिकारी आखिर खामोश क्यों हैं? चुनाव के समय खेत-खलिहानों में पहुंचने वाले नेता अब किसानों की सबसे बड़ी जरूरत पर चुप्पी साधे बैठे हैं। किसानों का आरोप है कि उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं बचा।
इस मामले में जब इफको क्षेत्र अधिकारी से बात की गई तो उन्होंने बताया कि “उसावां केंद्र पर बिक्री काफी कम हो गई थी, इसलिए इसे बिल्सी केंद्र से संबद्ध किया गया है। किसानों को वहां से खाद उपलब्ध कराई जा रही है।”
लेकिन किसानों का कहना है कि कागजों में व्यवस्था भले चल रही हो, जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। उनका सवाल है कि जब किसान को खाद लेने के लिए कई
किलोमीटर भटकना पड़े, समय और पैसा दोनों बर्बाद हों, तो ऐसी व्यवस्था का फायदा आखिर किसे मिल रहा है?
अब उसावां क्षेत्र में हर किसान की जुबान पर सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा है —
“जब खाद के लिए ही किसान दर-दर भटकेगा, तो आखिर खेतों में हरियाली कैसे बचेगी?”