*IPL की आड़ में सहसवान में ‘किस्मत का जुआ’, कोई काट रहा चांदी तो किसी की हो रही ‘मिट्टी पलीद’
संवाददाता आमिर शाह की रिपोर्ट न्याय पंचायत सहसवान
बदायूँ/ सहसवान- मैदान पर जब बल्ला घूमता है, तो सहसवान की गलियों में धड़कनें थम जाती हैं। लेकिन जनाब यह क्रिकेट प्रेम नहीं बल्कि रुपयों की रस्साकशी है। कस्बे में इन दिनों IPL का खुमार नहीं बल्कि सट्टे का काला बुखार सिर चढ़कर बोल रहा है। यहाँ क्रिकेट का खेल अब खेल नहीं रहा बल्कि अंधा बांटे रेवड़ी, अपनों-अपनों को दे की तर्ज पर नोट छापने का जरिया बन गया है।
सहसवान के मोहल्लों में बैठे सट्टे के खलीफा युवाओं को रातों-रात लखपति बनने के सब्ज बाग दिखा रहे हैं। जो युवा कल तक नौकरी की तलाश में एड़ियां रगड़ रहे थे। वे अब मोबाइल स्क्रीन पर दिन-रात एक कर रहे हैं। सटोरियों ने ऐसा जाल बुना है कि शरीफ लोग भी इसमें मछली की तरह फंस रहे हैं।
आलम यह है कि घर के चूल्हे की फिक्र छोड़कर लोग हवा में महल बनाने में जुटे हैं। घर फूंक तमाशा देख रहे सटोरिये कस्बे में सट्टे का कारोबार अब ऊँट की चोरी निहुरे-निहुरे नहीं रहा बल्कि हाई-टेक हो चुका है। व्हाट्सएप और टेलीग्राम पर ऐसे-ऐसे ग्रुप सक्रिय हैं
जहाँ घोड़ा उड़ने मैच पलटने के इशारे होते ही दांव लग जाते हैं। गली के मोड़ पर चाय की चुस्कियों के बीच कुछ बगुला भगत युवाओं को उकसाते हैं और देखते ही देखते उनकी गाढ़ी कमाई काफूर हो जाती है। शाम को जो खुद को तीस मार खां समझते हैं मैच की आखिरी गेंद तक आते-आते उनकी बोलती बंद हो जाती है।
बर्बादी की राह पर नौनिहाल सहसवान के जानकार बताते हैं कि कई परिवारों में चिराग तले अंधेरा छा जाता है। सट्टे की लत में डूबे युवा बहती गंगा में हाथ धोने के चक्कर में पिता की मेहनत की कमाई और घर के जेवर तक दांव पर लगा रहे हैं। जब जेब खाली होती है। तो सिर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसी स्थिति हो जाती है
और फिर शुरू होता है उधारी और तगादे का अंतहीन सिलसिला।
सफेदपोशों की पांचों उंगलियां घी में चर्चा है कि इस पूरे खेल के पीछे कुछ ऐसे चेहरे हैं जो समाज में दूध के धुले बनते हैं लेकिन पर्दे के पीछे से सट्टे की इस आग को हवा दे रहे हैं। ये बड़े खिलाड़ी खुद तो मलाई काट रहे हैं।
लेकिन छोटे सटोरियों और युवाओं की शामत आई हुई है’। सहसवान के उन जुआरियों को समझना होगा कि लालच बुरी बला है। जो आज चांदी की चम्मच से खाने के ख्वाब देख रहे हैं। कल उन्हें दाने-दाने को मोहताज। होना पड़ सकता है। सट्टे की यह दोधारी तलवार कभी किसी की सगी नहीं हुई।
वक्त रहते आंखें नहीं खुलीं तो सहसवान का यह हुनरमंद युवा वर्ग खयाली पुलाव पकाते-पकाते अपनी जिंदगी की लुटिया डुबो देगा। अब देखना यह है कि प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी इस नासूर को खत्म करने के लिए कब कमर कसते हैं।