श्री ब्रह्मदेव शिव मन्दिर लोची नगला बदायूं में चल रही श्रीमद भागवत साप्ताहिक कथा के प्रथम दिन के आरंभ में कलश यात्रा बड़ी ही धूमधाम से निकाली गई। कथा को वाणीमय स्वरूप देते आचार्य श्री
रवि कांत पाठक जी महाराज ने अपने मुखारविंद से प्रथम दिन बताया कि भागवत जी सुनने की क्या विधि है और यह कथा कैसे सुननी चाहिए? कथा का वाचन निर्धारित समय से हुआ जिसमें परीक्षित जी के जन्म आदि की
चर्चा की गई।आज कथा के तीसरे दिन की सती चरित्र का वर्णन किया गया। महाराज जी ने बताया कि कभी भी किसी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जहां आप जा रहे है
वहां आपका, अपने इष्ट या अपने गुरु का अपमान तो नहीं हो रहा। यदि ऐसी आशंका हो तो उस स्थान पर जाना नहीं चाहिए। चाहे वह स्थान अपने जन्म दाता पिता का ही घर क्यों न हो। सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए
भगवान शिव की बात को नहीं मानने पर सती के पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं को अग्नि में स्वाह होना पड़ा। ध्रुव चरित्र की कथा को सुनाते हुए कहा कि ध्रुव की सौतेली मां सुरुचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया
जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया। परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य और संयम की नितांत आवश्यकता रहती है। भक्त ध्रुव द्वारा तपस्या कर श्रीहरि को प्रसन्न करने की कथा को सुनाते हुए बताया कि भक्ति के लिए
कोई उम्र बाधा नहीं है। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए क्योंकि बचपन कच्चे मिट्टी की तरह होता है उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है। कथा के दौरान उन्होंने बताया कि पाप के बाद कोई
व्यक्ति नरकगामी हो, इसके लिए श्रीमद् भागवत में श्रेष्ठ उपाय प्रायश्चित बताया है। अजामिल उपाख्यान के माध्यम से इस बात को विस्तार से समझाया गया । साथ ही प्रह्लाद चरित्र के बारे में विस्तार से बताया कि भगवान नरसिंह रूप में लोहे के खंभे को फाड़कर प्रगट होना बताता है
कि प्रह्लाद को विश्वास था कि मेरे भगवान इस लोहे के खंभे में भी है और उस विश्वास को पूर्ण करने के लिए भगवान उसी में से प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप का वध कर प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की। कथा के दौरान भजन गायकों के साथ व्यास जी ने भक्ति भजनों की प्रस्तुति दी।सभी भक्त बहुत ही प्रेम भाव से कथा का श्रवण कर रहे हैं ।