धान की फसल में गंधी कीट व आभासी कंडुआ फल्स स्मट की रोक थाम हेतु एडवाइजरी जारी

Notification

×

All labels

All Category

All labels

धान की फसल में गंधी कीट व आभासी कंडुआ फल्स स्मट की रोक थाम हेतु एडवाइजरी जारी

Monday, September 22, 2025 | September 22, 2025 Last Updated 2025-09-22T14:35:09Z
    Share
धान की फसल में गंधी कीट व आभासी कंडुआ फल्स स्मट की रोक थाम हेतु एडवाइजरी जारी
बदायूँ : 22 सितम्बर। जिला कृषि रक्षा अधिकारी मनोज रावत ने किसानों को धान की फसल में लगने वाले गन्धी वग एंव आभासी कंडुआ से बचाव की एडवाइजरी जारी की है। जनपद में धान की फसल लगभग 153240 हैक्टेयर क्षेत्रफल में बोई गयी है, जो इस समय फसल लगभग 70 से 75 दिन की हो गयी है। अगेती फसलों में धान की बालियों भी निकल रही है। धान की इस अवस्था में गन्धी वग एंव आभासी कंडुआ प्रमुख कीट/रोग लगता है।

गन्धी वग-धान में फूल व बाली निकलने/दुग्धावस्था में एक कीट लगता है और धान के फूल व दाने के दूध को चूस लेता है, जिससे दाने नहीं पड़ते अथवा दाने के वजन में कमी हो जाती है। इस कीट के शिशु व व्यस्क दूधियाँ अवस्था में दानों से रस चूसते है और एक एक दाना भूसा बन जाता है व छेद के स्थान पर काले धब्बे बन जाते है इस कीट के अधिक प्रकोप होने पर धान के खेत में बदबू आने लगती हैं। 

जिससे धान का उत्पादन प्रभावित होता है एवं धान के दाने पर काले धब्बे पड़ जाते है। जिससे धान का बाजार मूल्य भी कम हो जाता है यदि यह गन्धी कीट धान की फूल निकलने की अवस्था में प्रति 100 पौधो पर 5 तथा दुग्धावस्था से लेकर दाना बनने की अवस्था तक प्रति 100 पौधों पर 10 कीट से अधिक दिख रहें है तो कीट के नियंत्रण हेतु विभिन्न उपाय अपनाये।

कीट का प्रबंधन-इस कीट के नियंत्रण हेतु 20 किग्रा० मैलाथियान 5 प्रति० धूल प्रति हैक्टेयर को सुबह सूर्य निकलने से पूर्व एवं सूर्यास्त के समय धान की फसल पर भुरकाव करें या मैलाथियान 50 प्रति० ई.सी. को 200 मिली दवा को 150 से 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें अथवा नीम ऑयल 15 प्रति. को 2.50 से 3 लीटर दवा की मात्रा को प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें। राजकीय कृषि रक्षा इकाइयों पर 50 प्रति. अनुदान पर मैलाथियान 50 प्रति. एवं 75 प्रति. अनुदान पर नीम ऑयल (नीम का तेल) उपलब्ध है।

आभासी कंडुआ फल्स स्मट-यह रोग अस्टीलगीनोझिया विरेनस नामक फफूंद के कारण होता है। यह रोग उन क्षेत्रों में जहाँ पर अधिक आर्द्रता 90 प्रति० से अधिक और 25-35 डिग्री सेटीग्रेड तापक्रम व मृदा में नत्रजन की अधिक मात्रा होने पर फैलता है। 

यह रोग बाली निकलने के बाद ही दिखाई पड़ता है। हवा इस रोग के बीजाणुओं को एक पौधे से दुसरे पौधे पर तीव्रता से फैलाती है। इस रोग का प्रभाव बालियों में किसी किसी दाने पर होता है प्रभावित दाने आकार में काफी बड़े व घुघरुओ जैसे होते हैं। रोग ग्रस्त दानों के फटने पर उनमें नारंगी रंग का पदार्थ दिखाई देता है। जो वास्तव में फफूंद होता है। शुरु में इन घुघंरुओं का रंग सफेद, नारंगी फिर पीलापन लिये रहा व बाद में हरापन लिये काला हो जाता है।

 इस रोग के कारण दानों का परीक्षण बजन कम हो जाता है। अंकुरण 35 प्रति० तक कम व उपज में भी कमी हो जाती है।
रोग का प्रबंधन-बीजाणु रहित बीज ही बोयें व 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम की दर से बीज उपचार अवश्य करें। बीज को 52 डिग्री सेन्टीग्रेड पर 10 मिनट तक उपचारित कर सकते है। 

नत्रजन खाद / उर्वरक का प्रयोग संतुलित मात्रा में करें। रोपाई के छः सप्ताह बाद नत्रजन खाद का प्रयोग न करे। इस रोग के रासायनिक उपचार हेतु कोसाइड (कॉपर हाइड्रोक्साइड) 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से गोभावस्था में स्प्रे करें।
-----
CLOSE ADS
CLOSE ADS
close