फर्जी ब्रिगेडियर की नेम प्लेट पर क्यों नहीं पड़ी इंटेलिजेंस की नजर ?
शाहजहांपुर। शहर में स्वयं को ब्रिगेडियर बताकर लंबे समय तक लोगों को प्रभावित करने वाले कथित फर्जी सैन्य अधिकारी के मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति ने अपने आवास के बाहर सेना के वरिष्ठ अधिकारी के नाम की बड़ी नेम प्लेट लगा रखी थी, उसके बारे में स्थानीय खुफिया तंत्र और संबंधित एजेंसियों को वर्षों तक भनक तक कैसे नहीं लगी?
बताया जा रहा है कि आरोपी न केवल स्वयं को सेना का अधिकारी बताता था, बल्कि सैन्य शैली में रहन-सहन अपनाकर लोगों के बीच प्रभाव भी जमाता था। उसके आवास के बाहर लगी नेम प्लेट, सैन्य पहचान से जुड़े प्रतीक और अन्य गतिविधियां खुलेआम संचालित होती रहीं, लेकिन किसी स्तर पर इनकी सत्यता की जांच नहीं हुई।
सूत्रों के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम कोई एक-दो दिन का नहीं बल्कि कई वर्षों से चल रहा था। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जिले में सक्रिय खुफिया इकाइयों और सूचना तंत्र को इस संबंध में कोई इनपुट क्यों नहीं मिला। आखिर वह कौन सी चूक रही, जिसके कारण इतनी बड़ी कथित फर्जीवाड़े की गतिविधि लंबे समय तक पर्दे के पीछे बनी रही?
विशेषज्ञों का मानना है कि सैन्य पद और पहचान का दुरुपयोग केवल व्यक्तिगत धोखाधड़ी का मामला नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील विषय भी हो सकता है। ऐसे मामलों में समय रहते सत्यापन और निगरानी आवश्यक होती है, ताकि किसी भी प्रकार की भ्रामक गतिविधि को रोका जा सके।
अब जब मामला उजागर हो चुका है, तो लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच एजेंसियां केवल आरोपी की भूमिका तक सीमित रहेंगी या फिर यह भी पता लगाएंगी कि इतने लंबे समय तक यह कथित फर्जीवाड़ा बिना किसी प्रभावी निगरानी के कैसे चलता रहा। जिले की खुफिया व्यवस्था, सूचना संकलन तंत्र और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी अब चर्चा के केंद्र में है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा महीनो तक सेना के वरिष्ठ अधिकारी की पहचान का उपयोग किया जाता रहा और उसके आवास पर लगी नेम प्लेट तक पर किसी की नजर नहीं गई, तो यह व्यवस्था की गंभीर चूक मानी जाएगी। अब सभी को जांच रिपोर्ट का इंतजार है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि आखिर जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी।